: सब के संग कान्हा रास रचाये-खेले होली रे - अनिल गुप्ता ग्वालियरी
Tue, Mar 7, 2023
सब के संग कान्हा रास रचाये
सब के संग खेले होली रे
श्याम ने ऐसो रंग लगायो
श्याम ने ऐसो रंग चढा़यो
श्याम रंग में यो रंग गई राधा
राधा ना रही गोरी रे
मोर-मुकुट, कमर मुरलिया
श्याम हाथ पिचकारी रे
तोड़ के, माखन लूटे
मन मोहन-गिरधारी रे
मन को भाये
श्री कृष्ण की लीला
उनकी माखन चोरी रे
श्याम ने ऐसो रंग चढा़यो--
नटखट-माखन चोर की बातें
मधुर मनोहर लागे रे
मधुर-मनोहर बंसी धुन सुन
प्रेम सभी उर जागे रे
खिचे जा रहे मन-मोहन से
बंधे प्रेम की डोरी रे
श्याम ने ऐसो रंग चढायो--
रंग लगाये, रास रचाये
माखन चोर मुरारी रे
श्याम-रंग में रंग सब मस्त है गये
सुध-बुध खोये नर-नारी रे
'अनिल'
कृष्ण-प्रेम रंग चढे़ बिना
जीवन-पाती कोरी रे
श्याम ने ऐसो रंग चढायो
गीतकार-अनिल गुप्ता ग्वालियरी
: बेटी की पुकार - डॉ रेखा दशोरा
Tue, Mar 7, 2023
युग बीता पर उसमें अब तक ,
आई नहीं दरार है ,
बेटा और बेटी के बीच ,
भेदभाव की दीवार है।
सामाजिक सोंच और विषमताएं
दिन रात उसे पोषित करती हैं ,
असमानता का जहर जडों को ,
गति लिए पक्का करती हैं ।
क्षमताओं और भावनाओं के ,
साक्ष्य बेटी जब देने जाती है,
हर बार ही निष्फल रहती है ,
हर बार आघात ही खाती है ।
संपत्ति हो या शिक्षा ,
भेद सदा है बरता जाता,
स्त्री कोख से जन्म लेकर भी ,
पुरुष ही बन जाता है विधाता।
कितने ही कानून बना दो ,
विकास हेतु चाहे करो प्रचार ,
मानसिकता में बदलाव बिना ,
नारी को नहीं मिलेंगे अधिकार।
परिवर्तन तो लाना होगा ,
घर घर अलख जगाना होगा ,
विश्व गुरु बनने के लिए ,
आंगन को समतल बनाना होगा।
डॉ रेखा दशोरा
: मैं पूछती हूँ आपसे - डा राजमती पोखरना सुराना भीलवाड़ा, राजस्थान
Tue, Mar 7, 2023
अपनी पीडा अपनी मौन व्यथाओ का,
अपनी ख़्वाहिशों ऑखों की सह्दयता का,
अपने अस्तित्व का परिचय मैं पूछती हूँ आज।
क्या लिखूं खुद की आजादी के लिये मैं आज,
लिखने को बोला गया मेरे जज़्बातो पर आज,
मेरे जज़्बातो की है कद्र क्या मै पूछती हूँ आज।
जीवन का आनंद खो गया आज ना जाने कहाँ,
जब से ली सुध मैंने मन ना जाने खोया कहाँ,
नीरस सा हुआ मन क्यों मै पूछती हूँ आज।
जीवन की करूण कथाओ का क्रंदन,
कहो तो आज कर दूँ मैं लूटे हुए जीवन को चित्रण
क्यों हुआ हाल जमाने में ऐसा मै पूछती हूँ आज।
वक्त की ऑधियो के साथ मुझे कुचला गया,
उन्मुत परिंदा थी मै मेरे पंखों को काटा गया,
मेरी चेतना को अचेतन क्यूँ किया मै पूछती हूँ आज।
मै तो नारी सभी की जिन्दगी की रोशनी हूँ,
प्रश्न फिर भी यही कि मैं क्यूँ सुनती रहती हूँ,
जिन्दा जिस्म को लाश बनाया क्यूँ मैं पूछती हूँ आज।
खुदा की कैसी रहमत है मुझ पर जानना चाहती हूँ,
चीख ,दर्द, पीड़ा, सहनशीलता, खामोशी के पिंजरे में कैद हूँ,
आख़िर क्यों दुखों का सैलाब मुझमें जमाने से मै पूछती हूँ आज ।
पूछना चाहती हूँ अपने दिल की हर बात आज मैं,
फ़सल मैंने तो अपनेपन की उगाई थी दुनियाँ में,
मेरे हिस्से की खुशियाँ क्यूँ गुमशुदा हुई मैं पूछती हूँ आज ।
अब कितना पूछू जमाने से मै तो पूछते पूछते थक गई ,
मेरी जिंदगी भी एक कहानी किस्सा बन कर रह गई,
क्या मिलेगी मेरे हिस्से का आसमां यही मैं पूछती हूँ आज ।।
डा राजमती पोखरना सुराना भीलवाड़ा, राजस्थान