: तुम भी आओ आज तो पिया, रंग जाओ मेरे रंग में - Dr. सुनीता संजीव दुबे
Tue, Mar 7, 2023
रंगो से भरी फिजाओं ने फिर हौले से मुस्कुराया है
लो फिर छाया फागुन का सुरूर, दिल ने फिर हौले से प्रीत को गुनगुनाया है
रंग उड़े, गुलाल उड़े, उड़ती है मस्ती हवाओं में
मन मिले, आनंद मिले और मिले दुलार जीवन की फिजाओं में
रंगो के इस इंद्रधनुष में और निखरे तेरा मेरा प्यार
कान्हा तो आए बरसाने, खेलन राधा संग होरी
तुम भी आओ आज तो पिया, रंग जाओ मेरे रंग में
उड़े तेरी प्रीत का गुलाल, मेरे भी मन मंदिर में
चंचल चितवन ने मस्त मगन हो प्रिय, दे ये स्नेह आमंत्रण तुम्हे बुलाया है
लो फिर छाया फागुन का सुरूर, दिल ने फिर हौले से प्रीत को गुनगुनाया है।
आज तो साजन हठ है, रंग ही दूंगी
तुमको मैं ऐसे जाने ना दूंगी
यू करना मुझसे जोराजोरी, मल ही दूंगी गुलाल मुख पर तेरे चोरी-चोरी
छूट न सका कान्हा के जीवन से, वो राधा का प्यार मलूंगी
रंग नहीं, बरसो-बरस न उतरे ऐसा खुमार मलूँगी
एक बार तो हाँ कर पिया, जीवन भर तेरा मान रखूंगी
कन्हैया के विश्वास, राधा की प्रीत का ही तो मेरे दिल पर शरमाया है
लो फिर छाया फागुन का सुरूर, दिल ने फिर हौले से प्रीत को गुनगुनाया है।।
Dr. सुनीता संजीव दुबे
: आओ होली की तैयारी करें - प्रीति बर्वे बडोले
Tue, Mar 7, 2023
आओ होली की तैयारी करें
चटकिलें , सुनहरे,छहरे रंगों को इस उत्सव में समाहित करें
आओ होली की तैयारी करें
कुछ अनाम रिश्तों की सिफारिश करें
अनजान पहलुओं की पहचान करें
रूठों को मनाने की साजीश करें
टूटे हुए तारों की नुमाइश करें
बिछड़ गए जो वक्त की मात से
उन रिश्तों की फरमाइश करें
आओ होली की तैयारी करें
यादों में रहते हैं जो हरपल
उन किस्सों में ताजगी भरें
बित गए जिनके बिना कई
दिन, महिने,साल,
संग कुछ पल बिताने की गुंजाइश करें
आओ होली की तैयारी करें
सूख गए वो गूलाब जो
रखें थे किताबों में
एकटक निहार कर उन्हें मन को मुस्कराहट से भरे
खो गई जो राहें सुनेपन से
उन राहों में ठहाकों की गूंज करें
आओ होली की तैयारी करें।
प्रीति बर्वे बडोले - इंदौर
: सरल नहीं जीवन की राह, इस पथ पर कई अंधेरे है -प्रीति बर्वे बडोले
Tue, Mar 7, 2023
जग के रिश्ते नातों की इस आग में जलने आई हुं।
तप कर कुन्दन बनता है,
मैं कुन्दन बनने आई हुं।
गहरे सागर से मोती निकलकर छनकर,धुलकर निखरकर,सजकर
जा बैठता है ईश्वर की प्रतिमा में सर पर,
वही चमकता हुआ मोती बनने आई हुं।
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं,,,
सरल नहीं जीवन की राह
इस पथ पर कई अंधेरे है,
धुंध,कोहरा, काली रात लपेटे,
अनगिनत काल के पहरे है।
पर धुएं के आगे
रोशनी और रात के आगे सवेरा है
इस संघर्षमय जीवन में
संघर्ष की परिभाषा बनने आई हुं,
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं।
तानो बानो का अंकन करती,
सर्वदा मूल्याकंन में रहती ख्वाइशो को परे रखती,
निर्गुणो से संपन्नता की ओर बढ़ने आई हुं,
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं।
ममता,त्याग, मर्यादा, समर्पण,पर्याय ये नारी के,
धिमही,दित्या,विणा,शायला स्वरुप सारे नारी के
जननी होकर भी सृष्टि की कहलाती दुखियारी बेचारी है।
विष को पिकर भी, तन को भस्म कर भी,
अमरत्व पाने आई हुं।
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं।
जग के रिश्ते नातों की इस आग में जलने आई हुं
तप कर कुन्दन बनता है मैं कुन्दन बनने आई हुं।
प्रीति बर्वे बडोले - इंदौर